….लेकिन बीवी लोन से निजात पाना बहुत मुश्किल है- विकास मिश्रा

….लेकिन बीवी लोन से निजात पाना बहुत मुश्किल है-  विकास मिश्रा
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होम लोन, पर्सनल लोन, ऑफिस लोन…इन सबसे उबरना आसान है, लेकिन बीवी लोन से निजात पाना बहुत मुश्किल है। शायद ही कोई पति हो जिस पर पत्नी ने कर्जा न चढ़ा दिया हो। आप जितनी बार पूरा कर्ज चुका देंगे, एकाध महीने बाद एक नई किस्त बन जाएगी, ऐसा खर्च बता दिया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी आपकी थी, लेकिन चुकाया पत्नी ने। पत्नी भले ही हाउसवाइफ हो, नौकरी न करती हो, लेकिन कर्ज तो चढ़ा ही देती है।
दिसंबर 1997 मेरा जब गौना हुआ था तो बीवी को मुंह दिखाई में तीन हजार से साढ़े तीन हजार रुपये के बीच मिले थे। बहुत कड़की का दौर था, मैंने उसमें से 2800 रुपये ले लिए। इसके बाद कर्ज चढ़ता रहा, उतरता रहा, लेकिन उबरने का सवाल ही नहीं था। चार साल पहले बीवी ने नोटिस दे दिया कि पहले गणना कर लीजिए कि कर्ज कितना हो चुका है। हिसाब वही, जो बीबी कहे वो सही। जोड़ जमाकर मामला 7200 रुपये पर छूटा। मुझे भी कुछ नया सूझा। हमने कहा कि तुम्हारा कर्ज हम चुका देंगे, लेकिन अलग तरीके से। एक बड़े राष्ट्रीय अखबार में मैंने बीवी के नाम से फीचर लिखना शुरू कर दिया। पेमेंट आता गया, बीवी के खाते में जमा होता गया। किसी फीचर का पांच सौ, किसी का सात सौ तो किसी का हजार। बीवी को मजा आने लगा, कर्जा तो वापस मिलने ही लगा, अखबार में नाम छपने का सुख ही अलग था, लेकिन मुसीबत दूसरी होने लगी। दो दर्जन से ज्यादा संस्करणों में छपने वाले अखबार में नाम और काम दोनों जाने लगा। ज्यादातर लेख, फीचर पर्यावरण पर थे। पर्यावरण से जुड़ी साइट्स पर भी ये लेख पोस्ट हो गए। लोग उस अखबार से मेरा नंबर जुगाड़ लिए। फोन आया तो इधर मैं था, बोले-मैडम से बात कराइए, मैंने पूछा बात क्या है, बोले-हम लोग पर्यावरण पर सेमीनार आयोजित कर रहे हैं, मैडम को उसमें बुलाना चाहते हैं। जीव संरक्षण वालों ने तो और परेशान किया। अब कैसे बताएं उन्हें असलियत। बुरे फंस चुके थे।
उस अखबार के फीचर डिपार्टमेंट को जिस तरह का लेख, फीचर चाहिए होता था, मैं एकाध घंटे में उसे करके भेज देता था। उनके लिए मैं मुफीद लेखक था। उनके यहां एक साप्ताहिक कॉलम छपता था शख्सियत का। उसमें ऐसी शख्सियत के बारे में छपता था, जिसने सिस्टम से लोहा लेकर अपनी नई पहचान बनाई। एक दिन मैंने उसमें आईपीएस और सोशल एक्टिविस्ट अमिताभ ठाकुर के बारे लिखा। छपने के तीन दिन बाद मैंने अमिताभ जी को फोन करके बताया कि फला अखबार में आपके बारे में छपा है, प्रति न मिली हो तो मैं भिजवा दूंगा। अमिताभ बोले- अरे भाई साहब तीन दिन से मैं परेशान हूं कि किसने लिखा है। मेरी तो बड़ी मदद हो गई, जाने कहां कहां से फोन आ रहे हैं मेरे पास। अगर आप लेखिका को जानते हैं तो कृपया उनका नंबर मुहैया करवा दें, मैं उन्हें धन्यवाद कहना चाहता हूं। खैर मैंने उन्हें असलियत बता दी।
इसके बाद बड़ा नैतिक सा सवाल मन में आया कि क्या पत्नी के नाम से लिखना ठीक है। स्वार्थी मन ने समझाया- नाम से क्या मतलब, पाठकों को अच्छा मिलना चाहिए। फिल्म अच्छी होनी चाहिए, सितारे कौन हैं इससे क्या मतलब… स्वार्थी मन की बात ज्यादा पल्ले नहीं पड़ी, नैतिकता ने जोर मारा और फिर ये सिलसिला बंद हो गया। वैसे भी बीवी का कर्जा सूद समेत पट गया था। खैर ये पोस्ट बीवी के कर्ज पर थी, वहीं रखते हैं। बीवी का कर्ज उस वक्त तो पाट दिया था, लेकिन अभी फिर बही खाता निकला है, फिर कर्जदार हो गया हूं। 30 मई को पत्नी के मायके में उसके दो भतीजों का जनेऊ था, एक का मुंडन और एक का अन्नप्राशन। जमकर विदाई काटी थी। मैं घर से निकला तो मुझे आठ हजार रुपये पकड़ा दिए, कहा कि इसे मेरे खाते में जमा कर दीजिएगा। वो पैसे तो मैंने फूंक डाले। खैर पत्नी गांव से अब चल चुकी है, अभी फोन पर बात हुई थी, ट्रेन गोंडा पार कर चुकी है। सुबह दिल्ली पहुंचेगी। अब बीवी का नया बही-खाता तैयार होगा। कर्जा एक बार फिर बढ़ जाएगा। और हां, भुक्तभोगी जानते होंगे कि ये कर्जा चिरंतन है, कभी माफ नहीं होता।

साभार- विकास मिश्रा, जाने माने लेख़क और वरिष्ठ पत्रकार है ये उनके निज़ी विचार है


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