दुनिया भर के मुसलमान ईद उल अज़हा पर जानवर की कुर्बानी क्यों देते हैं!

दुनिया भर के मुसलमान ईद उल अज़हा पर जानवर की कुर्बानी क्यों देते हैं!
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नदीम अख्तर की क़लम से::कुर्बानी ultimate sacrifice है जो आप खुदा की मुहब्बत में करते हैं। यानी इस ज़िन्दगी की अपनी सबसे प्यारी चीज़ खुदा पे कुर्बान कर देना। क्यों? उसे राज़ी करने के लिए। सो खुदा आपके बकरे की कुर्बानी का भूखा नहीं है और ना ही किसी अन्य जानवर की कुर्बानी का।

सबसे बड़ा सबाब तो ये है कि आप उस जानवर को अपने बच्चे की तरह घर में पालो। खिलाओ-पिलाओ, प्यार दो, सेवा करो। और जब आपको उस जानवर से अपनी औलाद की तरह मुहब्बत हो जाये तो खुदा की राह में उसे कुर्बान कर दो। कलेजे पे पत्थर रखकर। ये है असल कुर्बानी का जज़्बा जो इस्लाम के पैगम्बर हज़रत इब्राहीम अलै. से खुदा ने मांगी थी और कहा था कि मेरे लिए अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान कर सकते हो क्या? हज़रत इब्राहीम कोशिश करते रहे और अल्लाह कहता रहा- नहीं ये नहीं, वो चीज़ जो तुम्हें सबसे ज्यादा प्यारी है। फिर हज़रत इब्राहीम को समझ आया कि उन्हें तो सबसे ज्यादा प्यार अपने बेटे हज़रत इस्माइल से है। अपने अब्बा जान को परेशान देख छोटे से हज़रत इस्माइल को जब ये मालूम हुआ तो वो कहने लगे कि आप मुझे कुर्बान कर दीजिये अब्बा हुज़ूर! और उनकी मां पे क्या बीत रही थी, इसका वर्णन मुश्किल है। खैर! ये खुदा का इम्तिहान था। और जब आंख पे पट्टी बांधकर हज़रत इब्राहीम कांपते हाथों से छोटे से हज़रत इस्माइल की गर्दन पे छुरी चलाते हैं तो बेटे की जगह एक दुम्बा जानवर आ जाता है, जिसकी क़ुरबानी हो जाती है। हज़रत इब्राहीम खुदा की परीक्षा में पास हो जाते हैं और हज़रत इब्राहीम की उसी सुन्नत को पूरा करने के लिए दुनिया भर के मुसलमान ईद उल अज़हा पे जानवर की कुर्बानी देते हैं।

इसलिए बाजार से जानवर खरीदकर कुर्बान कर देना सुन्नत की अदायगी भले हो पर ये असल क़ुरबानी नहीं है। सो खबरदार जो ये कहा कि हम जानवर नहीं खरीदेंगे और उस पैसे को बाढ़ पीड़ित को भेजेंगे। अबे! क़ुरबानी तो खुदा के लिए करते हो। उसे इंसानों की मदद से क्यों जोड़ते हो? तुम्हारे पास अगर दौलत है तो ये इस्लाम में हुक्म है कि ज़रूरतमंदों की मदद करो। अगर नही है तब भी मदद की कोशिश करो। जितना हो सके। और ये मदद मजहब या कोई और दीवार देखकर ना करो। बिना किसी भेदभाव के करो। सो आप ज़रूर केरल के बाढ़ पीड़ितों की मदद कीजिये….

…पर भूल से भी ये ना कहिये कि क़ुरबानी का पैसा भेजेंगे। यानी आपके पास पैसे नहीं हैं, सो जो पैसा जोड़-जोड़ के क़ुरबानी के जानवर के लिए रखा था, उसे केरल भेजेंगे। यानी आप गरीब आदमी हैं और अगर क़ुरबानी की आपकी हैसियत नहीं है तो आप पे क़ुरबानी जायज़ नहीं है। ये हुक्म है। सो अगर माली हालत अच्छी है तभी प्रतीकात्मक क़ुरबानी की सुन्नत अदा करें। यानी किसी की आर्थिक मदद करने के बाद भी आपका बैंक बैलेंस बना रहता है तभी आपको क़ुरबानी की इजाज़त है। वरना मदद का पैसा आप दुनिया वालों की खिदमत में खर्च करें। ये ज्यादा जरूरी है। खुदा से अपना प्यार दिखाने के लिए क़ुरबानी सिर्फ जानवर की ही नहीं होती। अगर दारू पीते हैं या सूद खाते हैं तो ये छोड़ दें क्योंकि इस्लाम में ये हराम है। ये आपकी तरफ से खुदा की खिदमत में अप्रतिम क़ुरबानी होगी।

क़ुरबानी कोई दुनियावी चीज़ नहीं या कोई खरीद-फरोख्त की वस्तु नहीं कि इसे आप पैसे में तोल रहे हैं। जिस खुदा ने सारी कायनात बनाई, तुम उसको क्या पैसा दिखा रहे हो या पैसे से जानवर खरीदकर और फिर उसकी क़ुरबानी देकर खुदा को खुश करने की कोशिश कर रहे हो। उसकी नज़रों में ये सब मिट्टी है। तुम्हें तो पता भी नहीं कि इतने सालों में अब तक जितने जानवरों की क़ुरबानी तुमने दी है, वो कुबूल भी हुई है या नहीं!! इसलिए औकात में रहो और क़ुरबानी का पैसा केरल भेजने की बात बोलकर अपना मज़ाक ना बनाओ। अगर इस्लाम की जानकारी नहीं है तो थोड़ा पढ़-लिख लिया करो।

हर चीज़ शोशेबाजी के लिए नहीं होती। इस्लाम में कहा गया है कि दाएं हाथ से ऐसे मदद करो कि बाएं हाथ को भी पता ना चले। सो केरल वालों की मदद ऐसे करो कि कानोंकान किसी को खबर भी ना हो। मदद करके एहसान जताना और उसका ढिंढोरा पीटना इस्लाम में सख्त मना है।। साभार- नदीम अख़्तर


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